शाहेदा
दीपक राग चाहत अपनी, काहे सुनायें तुम्हें
हम तो सुलगते ही रहते हैं, कियों सुलगायें तुम्हें
गायिक:शाहेदा परवेज़
समय-सृजन की नई कड़ी स्वर-सृजन
समय सृजन की नई कड़ी स्वर सृजन में आप का स्वागत है। इंटरनेट असल में एक संपूर्ण माध्यम है। इसका दखल प्रिंट के समानान्तर ही श्रव्य और दृष्य (आडियो और वीडियो) के क्षेत्र में बराबर का है। हालांकि इंटरनेट पर इसका क्षेत्र-विस्तार आश्चर्यजनक है, लेकिन साहित्य की दृष्टि से अभी वह स्थिति नहीं है जो अपेक्षित है। इस चिट्ठे के ज़रिये मेरा प्रयास यही होगा कि साहित्य की विभिन्न विधाओं और गीत संगीत की गंभीर और कुछ साहित्यक प्रस्तुतियों से आप सब को आडियो और वीडियो के माध्यम से रू-बरू करवाया जाए!
Friday, August 29, 2008
दीपक राग चाहत अपनी…(शाहेदा परवेज़ की आवाज़ में)
प्रस्तुतकर्ता डा. मेराज अहमद पर 10:03 AM
विधा: गीत, शाहेदा परवेज़, ग़ज़ल
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